अजय तिवारी, संपादक
सड़कों पर आवारा कुत्तों का मुद्दा अब केवल नगर निगम की फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा संकट बन चुका है। हाल के दिनों में मासूम बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के जानलेवा हमलों ने देश को झकझोर कर रख दिया है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी—“यदि आप कुत्तों से प्यार करते हैं, तो उन्हें घर ले जाएं”—ने उस बहस को नई हवा दे दी है जो ‘पशु अधिकार’ और ‘मानवीय सुरक्षा’ के बीच लंबे समय से चल रही है। अदालत का यह कड़ा रुख उन ‘तथाकथित’ डॉग लवर्स और निष्क्रिय राज्य सरकारों के लिए एक चेतावनी है, जो समस्या के समाधान के बजाय उसे उलझाने का काम कर रहे हैं।
न्यायपालिका का कड़ा रुख और राज्य सरकारों की जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सड़कों पर कुत्तों द्वारा किए गए किसी भी हमले के लिए अब राज्य सरकारों की सीधी जवाबदेही होगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस मेहता की बेंच ने जो ‘भारी मुआवजा’ तय करने की बात कही है, वह दरअसल प्रशासन की सुस्ती पर एक आर्थिक चोट है। अब तक राज्य सरकारें ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ (ABC) नियमों की आड़ लेकर अपना पल्ला झाड़ती रही हैं, लेकिन कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि जब एक 9 साल का बच्चा या कोई बुजुर्ग अपनी जान गंवाता है, तो उसके लिए वह तंत्र जिम्मेदार है जो इन जानवरों को सार्वजनिक स्थलों पर बेरोकटोक घूमने की इजाजत देता है। यह टिप्पणी कि “अस्पतालों और स्कूलों में जब इंसान नहीं रह सकते, तो जानवर कैसे रह सकते हैं”, यह संकेत देती है कि अदालत अब सार्वजनिक स्थानों की शुचिता और सुरक्षा को लेकर किसी समझौते के मूड में नहीं है।
डॉग लवर्स और छद्म संवेदनशीलता पर प्रहार
अदालत ने इस मुद्दे के सबसे विवादित पहलू यानी ‘कुत्ता प्रेमियों’ की भूमिका पर भी प्रहार किया है। अक्सर देखा जाता है कि जब नगर निगम की टीमें कुत्तों को पकड़ने आती हैं, तो कुछ लोग और संगठन मानवाधिकारों से ऊपर पशु अधिकारों को रखकर बाधा उत्पन्न करते हैं। कोर्ट ने इसे ‘जवाबदेही’ से जोड़ा है। यदि आप किसी आवारा जानवर को खाना खिलाकर उसे एक विशेष क्षेत्र में रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, तो उस जानवर द्वारा किए गए किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी भी आप पर होनी चाहिए। अदालत की टिप्पणी कि “इंसान नहीं रह सकते, तो जानवर भी नहीं रह सकते”, दरअसल उन आरडब्ल्यूए (RWA) और समूहों को आइना दिखाती है जो बहुमत की सुरक्षा को दरकिनार कर कुछ लोगों की पसंद को थोपना चाहते हैं।
पारिस्थितिक तंत्र और लाइलाज बीमारियों का खतरा
संपादकीय का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू वह ‘वायरस’ और ‘लाइलाज बीमारी’ है जिसका जिक्र कोर्ट ने किया। रणथंभौर से लेकर लद्दाख तक, आवारा कुत्ते अब केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी खतरा बन गए हैं। लद्दाख में लुप्तप्राय प्रजातियों का संकट और बाघों में कुत्तों के जरिए फैलने वाले संक्रमण ने यह साबित कर दिया है कि यह समस्या अब शहरी गलियों से निकलकर हमारे नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को निगल रही है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि रेबीज और अन्य वायरल बीमारियों का कोई स्थायी इलाज संक्रमित पशु के लिए नहीं है, और ऐसी स्थिति में समाज को ‘खतरनाक’ और ‘सामान्य’ जानवरों के बीच अंतर करना ही होगा।
समाधान की दिशा
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप एक संतुलन बनाने की कोशिश है। पशुओं के प्रति क्रूरता नहीं होनी चाहिए, यह सर्वमान्य है, लेकिन ‘परोपकार’ की कीमत मानवीय जीवन नहीं हो सकती। राज्य सरकारों को अब केवल नसबंदी के नाम पर बजट खपाने के बजाय प्रभावी ‘शेल्टर होम’ और ‘जवाबदेह फीडिंग जोन’ की दिशा में काम करना होगा। अदालत की यह फटकार एक मौका है कि हम एक ऐसी नीति बनाएं जहाँ सड़कें इंसानों के लिए सुरक्षित हों और पशुओं के लिए भी मानवीय गरिमा वाले आश्रय स्थल हों। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो अदालती मुआवजे का बोझ और जनता का आक्रोश सरकारों के लिए संभालना मुश्किल होगा।