I-PAC: संवैधानिक मर्यादा, जांच की स्वायत्तता और चुनावी रणनीतियों का द्वंद्व

I-PAC: संवैधानिक मर्यादा, जांच की स्वायत्तता और चुनावी रणनीतियों का द्वंद्व

जांच की स्वायत्तता और राजनीतिक डेटा की गोपनीयता का महासंग्राम

अजय तिवारी, संपादक

भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में कुछ मामले ऐसे होते हैं, जो न केवल वर्तमान सत्ता संघर्ष को दर्शाते हैं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करते हैं। पश्चिम बंगाल में आई-पैक के कार्यालयों और उसके निदेशक प्रतीक जैन के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी और उसके बाद राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करना, इसका ही एक ज्वलंत उदाहरण है। यह विवाद अब केवल भ्रष्टाचार की जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘जांच की स्वायत्तता’ बनाम ‘राजनीतिक गोपनीयता’ के एक जटिल कानूनी युद्ध में तब्दील हो चुका है

प्रवर्तन निदेशालय का तर्क है कि उसकी कार्रवाई कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की कड़ियों को जोड़ने का एक हिस्सा है। केंद्रीय एजेंसियों का संदेह है कि अवैध कोयला खनन से अर्जित धन का एक बड़ा हिस्सा शेल कंपनियों के माध्यम से राजनीतिक विज्ञापनों और चुनावी प्रबंधन में खपाया गया हो सकता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आर्थिक अपराधों की निष्पक्ष जांच अनिवार्य है, और यदि भ्रष्टाचार के तार किसी कॉर्पोरेट या राजनीतिक परामर्शदाता फर्म से जुड़ते हैं, तो एजेंसी को वहां तक पहुँचने का वैधानिक अधिकार है। किंतु, इस मामले में जांच की टाइमिंग और प्रक्रिया ने विवादों को जन्म दिया है।

तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कड़ा विरोध एक गंभीर बिंदु की ओर इशारा करता है-‘राजनीतिक डेटा की गोपनीयता’। आई-पैक जैसी फर्में आज के दौर में किसी भी राजनीतिक दल की ‘थिंक टैंक’ होती हैं। उनके पास बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का डेटा, मतदाताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और भविष्य की गुप्त चुनावी रणनीतियां होती हैं। टीएमसी का यह आरोप कि “ईडी भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि रणनीति की चोरी करने आई है,” भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म देता है। क्या किसी जांच एजेंसी को मनी लॉन्ड्रिंग की आड़ में किसी दल की वैचारिक और रणनीतिक संपदा तक पहुँचने की अनुमति दी जा सकती है? यह प्रश्न आने वाले समय में निजता के अधिकार और जांच के अधिकार के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचने का काम करेगा।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्वयं रेड वाली जगह पर पहुंचना और बाद में 10 किलोमीटर लंबा मार्च निकालना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई अब प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक हो चुकी है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करना एक सोची-समझी कानूनी रणनीति है। कैविएट का अर्थ है कि शीर्ष अदालत ईडी की किसी भी अपील पर राज्य का पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न करे। यह कदम दर्शाता है कि राज्य सरकार को अंदेशा है कि ईडी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से कोई ऐसा कड़ा आदेश प्राप्त कर सकती है जो राज्य की पुलिस या प्रशासनिक मशीनरी के लिए मुश्किल पैदा कर दे।

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस के बीच बढ़ता टकराव है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। जब रक्षक ही आपस में भिड़ने लगें, तो व्यवस्था का चरमराना तय है। गृह मंत्रालय द्वारा ईडी और सीआरपीएफ से रिपोर्ट तलब करना मामले की संवेदनशीलता को और बढ़ाता है। संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य के बीच सहयोग की अपेक्षा की जाती है, लेकिन बंगाल के मामले में हम लगातार ‘सहयोगात्मक संघवाद’ की जगह ‘प्रतिस्पर्धी और प्रतिशोधी संघवाद’ देख रहे हैं।

यदि जांच एजेंसियां किसी दल की चुनावी मशीनरी में इस तरह दखल देती हैं, तो इससे निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा प्रभावित हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, यदि राजनीतिक संरक्षण के नाम पर आर्थिक अपराधों की जांच को रोका जाता है, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) की पराजय होगी। आई-पैक विवाद में सच्चाई क्या है, यह तो अदालती कार्यवाही और ठोस सबूतों से ही स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल इसने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अब यह चुनौती है कि वह इस मामले में एक संतुलन स्थापित करे। एक ओर जहां मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों की तह तक जाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि जांच एजेंसियां किसी सत्ताधारी दल के लिए ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में कार्य न करें। आई-पैक केस भविष्य के लिए एक नजीर बनेगा कि डिजिटल युग में राजनीतिक डेटा की सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के बीच की सीमा रेखा कहां होनी चाहिए।


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