अजय तिवारी, संपादक
उत्तर प्रदेश की हालिया ड्राफ्ट मतदाता सूची के आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गहराई को भी दर्शाते हैं। चुनाव आयोग द्वारा 2.89 करोड़ नामों को सूची से हटाना कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है; यह ‘हर पांचवें वोटर’ के बाहर होने की एक ऐसी सर्जरी है, जिसने चुनावी आंकड़ों से ‘वसा’ को छांटने का काम किया है। 12.55 करोड़ के मौजूदा आंकड़ों में से 46 लाख मृतकों के नाम हटाना इस बात का प्रमाण है कि हमारी मतदाता सूचियां दशकों से तकनीकी त्रुटियों और लापरवाही का बोझ ढो रही थीं।
इस पुनरीक्षण का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब प्रति बूथ मतदाताओं की वास्तविक संख्या स्पष्ट होगी, जिससे चुनाव प्रबंधन अधिक सटीक हो सकेगा। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में नामों का कटना – जिसमें विस्थापन, दोहरी प्रविष्टियां और मृत व्यक्ति शामिल हैं – प्रशासनिक मुस्तैदी पर मुहर तो लगाता है, लेकिन साथ ही एक गंभीर सवाल भी खड़ा करता है: क्या इस प्रक्रिया में कोई वास्तविक मतदाता तो वंचित नहीं रह गया?
उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में, जहाँ जीत का अंतर अक्सर बहुत कम होता है, वहां 2.89 करोड़ नामों का विलोपन भविष्य के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। यह कदम फर्जी मतदान की संभावनाओं को न्यूनतम करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। अब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि वे केवल ‘हवा’ में दावे करने के बजाय जमीनी स्तर पर अपने सक्रिय मतदाताओं की पुष्टि करें।
2.89 करोड़ नामों का कटना किसी भी राजनीतिक दल के लिए ‘पैनिक बटन’ दबाने जैसा है। उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत का गणित अक्सर बहुत कम अंतर पर टिका होता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का बाहर होना सीधे तौर पर पार्टियों के ‘वोट बैंक’ की गणितीय सटीकता को प्रभावित करेगा। सत्ता पक्ष इसे ‘स्वच्छ लोकतंत्र’ और ‘भ्रष्टाचार मुक्त मतदान’ के रूप में भुनाएगा, जबकि विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि क्या इस ‘सफाई अभियान’ की आड़ में उनके पारंपरिक वोट आधार को तो निशाना नहीं बनाया गया?
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अब तक राजनीतिक दल ‘हवा’ बनाने और रैलियों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते थे, लेकिन इस शुद्धि अभियान के बाद अब पूरा ध्यान पन्ना प्रमुखों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं पर स्थानांतरित हो जाएगा। अदलों को अब यह सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा कि उनके समर्थक न केवल मतदाता सूची में हों, बल्कि उनका नाम सही ढंग से दर्ज भी हो।
मृत और दोहरे नामों के हटने से ‘फर्जी मतदान’ की गुंजाइश खत्म होगी, जो उन दलों के लिए बड़ा झटका है जो चुनावों में अवैध वोटिंग के भरोसे रहते थे। आने वाले समय में यूपी की राजनीति ‘संख्या बल’ से ज्यादा ‘सटीक बल’ पर आधारित होगी। यह कदम पार्टियों को मजबूर करेगा कि वे अपने कैडर को और अधिक प्रोफेशनल बनाएं। 2026 और उसके बाद के चुनावों में केवल वही दल टिक पाएगा, जिसका जमीनी नेटवर्क सबसे मजबूत होगा और जो यह सुनिश्चित कर पाएगा कि उसके समर्थक का नाम इस नई और संशोधित सूची में सुरक्षित है। असल मायने में, यह ‘चुनावी कचरे’ की सफाई न होकर रणनीतिकारों की नई अग्निपरीक्षा है।