अजय तिवारी. एडिटर इन चीफ
अक्सर हम स्वाधीनता और स्वतंत्रता को एक ही मानते हैं, लेकिन दोनों में एक सूक्ष्म और गहरा अंतर है। स्वतंत्रता हमें अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी करने की छूट देती है, जबकि स्वाधीनता हमें यह मौका देती है कि हम अपने जीवन का निर्माण खुद करें, लेकिन समाज के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का ध्यान रखते हुए। स्वाधीनता, अपने मूल रूप में, पूर्ण अराजकता नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जहां हर व्यक्ति को अपने अधिकारों का उपभोग करने की आज़ादी है, लेकिन इस बात की सीमा के साथ कि उसके कार्य किसी और के अधिकारों का हनन न करें। इस तरह, स्वाधीनता हमें अपने अधिकार हासिल करने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन साथ ही हमें कुछ पाबंदियों में भी बांधती है ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे।
स्वाधीनता हमें अधिकार देती है, जैसे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी, और शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार। ये अधिकार हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य हैं। लेकिन इन अधिकारों को हासिल करने के लिए हमें कुछ जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि हम किसी भी व्यक्ति या समूह के खिलाफ घृणा फैलाएं या अफवाहें फैलाएं। हमारी अभिव्यक्ति की सीमा वहीं खत्म हो जाती है, जहां से दूसरे व्यक्ति की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को ठेस पहुंचने लगती है। इसी तरह, हमें अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम समाज के नियमों का पालन करें और दूसरों के प्रति सम्मान दिखाएं।
स्वाधीनता का दूसरा पहलू है कर्तव्य का पालन। एक स्वाधीन राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्तव्य है कि हम देश की अखंडता और एकता को बनाए रखें, समाज में शांति और सौहार्द्र का माहौल बनाएं, और देश के विकास में योगदान दें। यह कर्तव्य हमें स्वेच्छा से निभाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि हमारे अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम केवल अपने अधिकारों की मांग करेंगे और अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेंगे तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। एक संतुलित समाज वही है, जहाँ लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग हों, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से लें।
स्वाधीनता हमें एक दोहरी जिम्मेदारी सौंपती है , तरफ हमें अपने अधिकारों का उपभोग करने का मौका मिलता है, और दूसरी तरफ हमें समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है। यह पाबंदियाँ हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनाती हैं। यह पाबंदियाँ हमें स्वछंद होने की बजाए स्व-अनुशासित होना सिखाती हैं। यही सच्चा अर्थ है स्वाधीनता का, जहाँ अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे के पूरक होते हैं।
स्वाधीनता की बधाई! जय हिन्द!!